छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज 10 सितंबर को पारंपरिक पोला पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व कृषि कार्यों में बैलों और पशुधन के योगदान के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने से जुड़ा है। महाराष्ट्र पर्यटन के अनुसार बैल पोला किसानों और बैलों के बीच गहरे संबंध को दर्शाने वाला पारंपरिक पर्व है। इस दिन पशुधन की पूजा-अर्चना कर उनके योगदान के प्रति आभार जताया जाता है।
बैलों को काम से आराम देकर किया गया श्रृंगार
पोला के अवसर पर किसान अपने बैलों को कृषि कार्य से विश्राम देते हैं। बैलों को नहलाने के बाद उनके सींगों को रंगों से सजाया जाता है और गले में घंटियां, फूलों की मालाएं तथा अन्य पारंपरिक सजावटी वस्तुएं पहनाई जाती हैं। इसके बाद उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में सजाए गए बैलों को जुलूस के रूप में भी निकाला जाता है, जहां ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक उत्सव का माहौल देखने को मिलता है।
मिट्टी और लकड़ी के बैलों की भी पूजा
जिन परिवारों के पास वास्तविक बैल नहीं हैं, वहां मिट्टी या लकड़ी से बने बैलों की पूजा की परंपरा भी देखने को मिलती है। बच्चों के लिए यह पर्व खास आकर्षण लेकर आता है और बाजारों में पारंपरिक खिलौना बैल तथा पोला से जुड़ी वस्तुओं की बिक्री होती है। महाराष्ट्र के नागपुर में इस वर्ष भी पोला से जुड़ी पुरानी परंपराओं और लकड़ी के बैलों के बाजार में विशेष चहल-पहल देखने को मिली है।






