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इंदौर में राहुल गांधी का छात्रों से संवाद: राहुल गांधी ने इंदौर में छात्रों के रोजगार‑भर्ती मुद्दे पर सरकार को घेरा

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने शनिवार 19 सितंबर 2026 को इंदौर में कांग्रेस के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को संबोधित किया। यह इस अभियान का पांचवां कार्यक्रम था, जिसका फोकस शिक्षा, भर्ती, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर रखा गया था। कार्यक्रम रीजनल पार्क के सामने स्थित IDA के मैदान में आयोजित किया गया, जिसे कांग्रेस ने ‘भारत जोड़ो मैदान’ नाम दिया था। इससे पहले कार्यक्रम के लिए नेहरू स्टेडियम का विकल्प सामने आया था, लेकिन अनुमति संबंधी विवाद के बाद आयोजन स्थल बदला गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवा और छात्र पहुंचे। आयोजकों ने पहले करीब 15 से 20 हजार लोगों के पहुंचने का अनुमान जताया था, जबकि कांग्रेस की ओर से पंजीकरण का आंकड़ा इससे काफी अधिक बताया गया था।

शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पर राहुल गांधी के आरोप
राहुल गांधी ने अपने संबोधन में छात्रों के सवाल पूछने और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं, रोजगार और सरकारी संस्थानों की कार्यप्रणाली जैसे मुद्दे उठाए। उन्होंने कहा कि छात्र स्वभाव से सवाल पूछता है और किसी बात को सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं करता क्योंकि उसे बता दिया गया है। राहुल गांधी ने अपने भाषण में ‘सिस्टम’ पर भी सवाल उठाए और कहा कि सवाल पूछने वाले छात्रों को दबाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने ‘अंधभक्त’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए अपनी राजनीतिक आलोचना रखी। ये टिप्पणियां राहुल गांधी के भाषण और उनके राजनीतिक दावों का हिस्सा थीं, जिन्हें उसी रूप में रिपोर्ट किया जाना चाहिए।

MPPSC और भर्ती प्रक्रिया का मुद्दा उठा
इंदौर के कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के युवाओं से जुड़े भर्ती और नौकरी के मुद्दे भी प्रमुख रहे। राहुल गांधी ने MPPSC समेत सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं और खाली पदों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने भर्ती में देरी, कानूनी विवाद और युवाओं को रोजगार नहीं मिलने का मुद्दा उठाया। कार्यक्रम में मौजूद छात्रों ने भी परीक्षा और नियुक्ति से जुड़ी अपनी समस्याएं राहुल गांधी के सामने रखीं। दूसरी ओर, बीजेपी की ओर से राहुल गांधी के आंकड़ों और दावों पर सवाल उठाए गए। ‘झूठ की गूंज’ नाम की वेबसाइट और उसके सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए राहुल गांधी के कुछ दावों का खंडन करने की कोशिश की गई। इसलिए इन आंकड़ों को बिना स्वतंत्र सत्यापन के स्थापित तथ्य के तौर पर लिखने के बजाय संबंधित पक्षों के दावों के रूप में प्रस्तुत करना उचित है।