दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध मानी जाने वाली शादी का दावा, 18 साल से कम उम्र की पत्नी से यौन संबंध के मामले में POCSO कानून के तहत आपराधिक जिम्मेदारी से स्वतः छूट नहीं देता। अदालत ने कहा कि पर्सनल लॉ POCSO और भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।
16 साल की लड़की से जुड़ा मामला
मामले में एक 28 वर्षीय व्यक्ति ने 16 साल 3 महीने की लड़की से शादी की थी। दंपती ने मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला देते हुए FIR रद्द करने की मांग की थी, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।
शादी और आपराधिक कानून में अंतर
अदालत ने शादी की कथित वैधता और यौन अपराध से जुड़ी आपराधिक जिम्मेदारी को अलग-अलग कानूनी प्रश्न माना। POCSO कानून में 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना गया है और ऐसे मामलों में उम्र एक महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य है।
अन्य अदालतों के फैसलों का भी उल्लेख
अदालत के सामने ऐसे पुराने फैसलों का भी संदर्भ आया जिनमें विभिन्न हाईकोर्टों ने मुस्लिम पर्सनल लॉ और POCSO के संबंध को अलग-अलग तरीके से देखा था। हालिया न्यायिक रुख में पर्सनल लॉ को POCSO के ऊपर प्राथमिकता देने के तर्क को स्वीकार नहीं किया गया है।






