चाणक्य की तीन छन्नी का संदेश
एक बार चाणक्य का एक परिचित उनसे मिलने आया और उनके मित्र के बारे में कुछ बताने लगा। चाणक्य ने उसकी बात बीच में रोकते हुए कहा कि किसी के बारे में कुछ भी बताने से पहले उस बात को तीन छन्नियों से परखना चाहिए। उनका उद्देश्य था कि बिना सत्यापन, बिना भलाई और बिना उपयोगिता वाली बातों को आगे बढ़ाने से बचा जाए।
पहली छन्नी है सत्य
चाणक्य ने परिचित से पूछा कि क्या वह पूरे विश्वास के साथ कह सकता है कि उसके द्वारा बताई जाने वाली बात पूरी तरह सत्य है। व्यक्ति ने स्वीकार किया कि उसने वह बात अभी-अभी किसी से सुनी है और उसे इसकी सच्चाई की पूरी जानकारी नहीं है। चाणक्य ने समझाया कि जब किसी बात की सत्यता ही निश्चित नहीं है, तो उसे आगे बताना उचित नहीं होना चाहिए।
दूसरी छन्नी है भलाई
इसके बाद चाणक्य ने पूछा कि क्या वह उनके मित्र के बारे में कोई अच्छी बात बताने जा रहा है। व्यक्ति ने नकारात्मक बात बताने की बात स्वीकार की। चाणक्य ने संकेत दिया कि अगर कोई बात अच्छी नहीं है और उसकी सच्चाई भी निश्चित नहीं है, तो उसे किसी दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाने से केवल गलतफहमी या नुकसान पैदा हो सकता है।
तीसरी छन्नी है उपयोगिता
चाणक्य ने तीसरा सवाल किया कि क्या वह बात उनके लिए किसी तरह उपयोगी है। व्यक्ति ने जवाब दिया कि शायद वह बात उनके किसी काम की नहीं है। तब चाणक्य ने कहा कि जो बात न सत्य है, न अच्छी है और न ही उपयोगी है, उसे बताने का कोई लाभ नहीं है।
सुनी-सुनाई बात को आगे बढ़ाने से बचें
इस प्रसंग की सीख यही है कि किसी परिचित, मित्र या रिश्तेदार के बारे में कोई बात सुनने पर उसे तुरंत आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। पहले यह देखना जरूरी है कि बात सच है या नहीं, उससे किसी की भलाई होती है या नहीं और क्या उसका जानना वास्तव में जरूरी या उपयोगी है। ऐसा करने से अफवाहों और गलतफहमियों को फैलने से रोका जा सकता है।
जीवन में अपनाएं तीन परीक्षण
सत्य, भलाई और उपयोगिता की ये तीन छन्नियां रोजमर्रा की बातचीत में भी अपनाई जा सकती हैं। किसी भी बात को साझा करने से पहले कुछ पल रुककर इन तीन सवालों पर विचार करना रिश्तों में विश्वास बनाए रखने और अनावश्यक विवाद से बचने में मदद कर सकता है। इस प्रेरक प्रसंग का संदेश है कि हर सुनी हुई बात दूसरों तक पहुंचाना जरूरी नहीं होता।







