बॉम्बे हाईकोर्ट ने 22 अक्टूबर को एक महत्वपूर्ण फैसले में मुंबई के कारोबारी बिपिन सतीश चंद्र अग्रवाल की गिरफ्तारी और हिरासत को अवैध करार दिया। अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि वह अग्रवाल को दो सप्ताह के भीतर ₹5 लाख का मुआवजा दे। साथ ही, मामले में संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और संबंधित मजिस्ट्रेटों के आचरण की जांच के लिए फैसले को हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के समक्ष रखने का निर्देश दिया।
26 दिन तक हिरासत में रहे कारोबारी
मामले के अनुसार, अग्रवाल को अगस्त 2017 में जबरन वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वह अपनी सास की ओर से एक फ्लैट के पुनर्विकास से जुड़े सौदे में अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में बातचीत कर रहे थे। फ्लैट की बिक्री की रकम को लेकर डेवलपर और अग्रवाल के बीच विवाद हुआ था। अग्रवाल के अनुसार, उन्हें मिली रकम प्रस्तावित संपत्ति सौदे से संबंधित थी। गिरफ्तारी के बाद उन्हें छह दिन पुलिस हिरासत और 20 दिन न्यायिक हिरासत में रखा गया।
गिरफ्तारी की जरूरत साबित नहीं कर सकी पुलिस
जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता की खंडपीठ ने पुलिस रिकॉर्ड, गिरफ्तारी से संबंधित दस्तावेजों और रिमांड आदेशों की जांच की। अदालत ने पाया कि पुलिस यह स्पष्ट करने में विफल रही कि अग्रवाल को गिरफ्तार करना क्यों आवश्यक था। कोर्ट ने यह भी कहा कि कथित अपराध में अधिकतम तीन वर्ष की सजा का प्रावधान होने के बावजूद गिरफ्तारी से पहले कानूनी प्रक्रिया और CrPC की धारा 41A से जुड़ी आवश्यकताओं के पालन को लेकर पर्याप्त आधार रिकॉर्ड पर नहीं मिला।
पुलिस की कार्रवाई और दस्तावेजों पर गंभीर सवाल
अदालत ने मामले के रिकॉर्ड में ऐसी गड़बड़ियां पाईं, जिनसे अग्रवाल को हिस्ट्री-शीटर और जबरन वसूली करने वाले व्यक्ति के रूप में पेश करने की कोशिश किए जाने पर सवाल उठे। खंडपीठ ने पुलिस सब-इंस्पेक्टर और डेवलपर के बीच मिलीभगत तथा कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को लेकर गंभीर टिप्पणियां कीं। अदालत के अनुसार, शिकायत की सच्चाई की उचित जांच किए बिना गिरफ्तारी की गई और याचिकाकर्ता के कानूनी अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
मजिस्ट्रेटों की भूमिका पर भी उठे सवाल
हाईकोर्ट ने रिमांड की प्रक्रिया पर भी चिंता जताई। अदालत के अनुसार, संबंधित मजिस्ट्रेटों ने हिरासत की अनुमति देते समय पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए और मामले की जरूरी जांच-पड़ताल नहीं की। कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि फैसले को प्रशासनिक समिति के सामने रखा जाए, ताकि संबंधित मजिस्ट्रेटों के खिलाफ उचित कार्रवाई पर विचार किया जा सके।
पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश
खंडपीठ ने महाराष्ट्र सरकार को संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया, जिसमें तत्काल निलंबन भी शामिल है। अदालत ने यह भी कहा कि उचित पाए जाने पर मुआवजे की राशि संबंधित अधिकारियों के वेतन से वसूलने पर विचार किया जा सकता है। मुआवजे के भुगतान के लिए दो सप्ताह की समय-सीमा तय की गई है।
नागरिकों के कानूनी अधिकारों पर अहम टिप्पणी
यह फैसला गिरफ्तारी की वैधता, पुलिस की जवाबदेही और न्यायिक रिमांड के दौरान मजिस्ट्रेट की भूमिका से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। अदालत की टिप्पणियां इस बात पर जोर देती हैं कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने से पहले कानून में निर्धारित प्रक्रियाओं और गिरफ्तारी की आवश्यकता का उचित आधार होना चाहिए।







