सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को वंदे मातरम से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर के बीच तीखी बहस हुई। मामला कर्नाटक संगीतकार टी.एम. कृष्णा की याचिका से जुड़ा है, जिसमें वंदे मातरम के सभी छह अंतरों के गायन से संबंधित केंद्र के निर्देशों और 2026 में किए गए कानूनी संशोधन को चुनौती दी गई है।
‘नक्सली’ टिप्पणी पर विवाद
सुनवाई के दौरान मुरलीधर ने संवैधानिक प्रक्रिया और कानून बनाने में व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत पर दलील रखी। इसके जवाब में तुषार मेहता ने संवैधानिक तरीके से निर्णय लेने के संदर्भ में ‘नक्सली’ विचारधारा का उल्लेख किया। मुरलीधर ने इस शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए इसे वापस लेने की मांग की।
मेहता ने टिप्पणी वापस नहीं ली
रिपोर्टों के मुताबिक, तुषार मेहता ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार किया और कहा कि उनका संदर्भ किसी व्यक्ति के बजाय ऐसी विचारधारा से था, जिसे वह संवैधानिक प्रक्रिया के विरोध से जोड़ रहे थे। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने इस दौरान कहा कि किसी मुद्दे पर अलग विचार रखना किसी व्यक्ति को ‘नक्सली’ नहीं बनाता।
CJI ने बहस सीमित रखने को कहा
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बहस को मामले के कानूनी सवालों तक सीमित रखने पर जोर दिया। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी सुनवाई के दौरान संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के महत्व पर टिप्पणी की। अदालत ने संकेत दिया कि किसी व्यक्ति के विचार या पहचान से उसके संवैधानिक अधिकार खत्म नहीं होते।
वंदे मातरम के गायन पर कानूनी सवाल
टी.एम. कृष्णा की याचिका 2026 के संशोधन और केंद्र के उन निर्देशों को चुनौती देती है, जिनमें कुछ सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक अवसरों पर वंदे मातरम के छह अंतरों के गायन का प्रावधान किया गया है। संशोधित कानून में वंदे मातरम के गायन को जानबूझकर रोकने या उसके गायन में लगे समूह को बाधित करने पर दंड का प्रावधान किया गया है।




