SIR को लेकर चुनाव आयोग से सवाल
बॉम्बे हाई कोर्ट ने गोवा की मतदाता सूची से भारतीय नागरिकों के नाम हटाए जाने को लेकर चुनाव आयोग से कड़े सवाल पूछे हैं। जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की पीठ के सामने परेश सालगांवकर और उनके परिवार के पांच सदस्यों के नाम हटाए जाने का मामला आया। कोर्ट ने सवाल किया कि जब संबंधित लोग भारतीय नागरिक हैं और उन्होंने पता बदलने के लिए फॉर्म 8 भी भरा था, तो उनके नाम वोटर लिस्ट से कैसे हट गए।
‘अगर नागरिक ही बाहर हो जाएं तो SIR का मकसद क्या’
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी पर जोर देते हुए पूछा कि अगर SIR की प्रक्रिया के कारण भारतीय नागरिक ही मतदाता सूची से बाहर हो जाते हैं तो इस प्रक्रिया का उद्देश्य क्या रह जाता है। अदालत ने कहा कि SIR का मकसद केवल यह देखना नहीं होना चाहिए कि मतदाता किसी विशेष स्थान पर मौजूद है या नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि मतदाता भारतीय नागरिक है।
फॉर्म 6 और फॉर्म 8 पर विवाद
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील गौरीश अग्नि ने कहा कि SIR के तहत जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए थे, क्योंकि उन्होंने एन्यूमरेशन फॉर्म नहीं भरे थे, उनके लिए फॉर्म 8 पर कार्रवाई नहीं की जा सकती थी। उनके अनुसार ऐसे व्यक्ति नए इलाके में नए मतदाता के तौर पर फॉर्म 6 भर सकते हैं। इसके विपरीत कोर्ट ने फॉर्म 8 के उद्देश्य को लेकर अलग
स्थिति सामने रखी और कहा कि यह पता बदलने तथा मतदाता सूची में आवश्यक सुधार से जुड़ा है।
वोटर को ‘कैच-22’ स्थिति में डालने पर सवाल
कोर्ट ने चुनाव आयोग को Registration of Electors Rules, 1960 के नियम 21 की याद दिलाते हुए कहा कि प्रक्रिया को मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर देखा जाना चाहिए, न कि केवल ड्राफ्ट सूची के आधार पर। अदालत ने कहा कि अन्यथा मतदाता के पास अपने नाम को लेकर कोई प्रभावी रास्ता नहीं बचेगा। पीठ ने इस स्थिति को ‘कैच-22’ बताते हुए सवाल किया कि एक मौजूदा मतदाता को ऐसी प्रक्रिया में कैसे रखा जा सकता है, जहां दोनों विकल्प उसके लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं।
फॉर्म में गलत घोषणा को लेकर कोर्ट की आपत्ति
पीठ ने सवाल किया कि जो व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान पर चला गया है और जिसका नाम पहले से किसी दूसरी मतदाता सूची में दर्ज है, उससे नए स्थान की सूची में नाम शामिल कराने के लिए ऐसी घोषणा कैसे कराई जा सकती है जिसमें वह खुद को उसी स्थान का मतदाता बताता हो। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में मतदाता के लिए गलत घोषणा पर हस्ताक्षर करने का जोखिम पैदा हो सकता है।
परिवार को नोटिस देने पर भी सवाल
कोर्ट ने चुनाव आयोग से यह भी पूछा कि सालगांवकर परिवार के नाम मतदाता सूची से हटाने से पहले उन्हें कोई नोटिस दिया गया था या नहीं। चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि अलग-अलग स्तरों पर नोटिस बोर्ड पर सूचनाएं लगाई गई थीं, क्योंकि आयोग के पास मतदाताओं की नई जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकती थी। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस प्रक्रिया को लेकर भी स्पष्टीकरण मांगा।
एन्यूमरेशन फॉर्म और एनेक्जर मांगे
बॉम्बे हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को एन्यूमरेशन फॉर्म और उसके साथ लगाए जाने वाले एनेक्जर अदालत में जमा करने को कहा। पीठ ने इन दस्तावेजों को मामले की सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण माना। स्रोत के अनुसार, अदालत इस मामले की सुनवाई मंगलवार को भी जारी रखने वाली थी।







