हथियार का हार’ में पुरस्कारों पर सवाल
मुकेश भारद्वाज के कॉलम ‘बेबाक बोल’ में प्रकाशित लेख ‘हथियार का हार’ साहित्यिक पुरस्कारों, पुरस्कार वापसी और सत्ता के साथ साहित्य के संबंधों पर सवाल उठाता है। लेख में लेखक ने 2015 की पुरस्कार वापसी की बहस को मौजूदा साहित्यिक परिदृश्य से जोड़ते हुए अपने विचार रखे हैं।
पुरस्कार वापसी की पुरानी बहस
लेख में सितंबर 2015 के दादरी कांड और एमएम कलबुर्गी की हत्या के बाद शुरू हुई पुरस्कार वापसी की मुहिम का उल्लेख किया गया है। लेखक के अनुसार, उस समय कई साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों ने पुरस्कारों को सार्वजनिक नैतिक प्रतिरोध के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया था।
अखलाक और कलबुर्गी का संदर्भ
मुकेश भारद्वाज ने लेख में मोहम्मद अखलाक और एमएम कलबुर्गी की याद को साहित्य और सार्वजनिक प्रतिरोध की बहस से जोड़ा है। लेख का तर्क है कि पुरस्कारों को लेकर बदले रुख को उसी दौर में स्थापित नैतिक और सार्वजनिक रुख के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।
पुरस्कार और सत्ता का संबंध
लेख में साहित्यिक पुरस्कारों के स्रोत, सत्ता से उनके संबंध और पुरस्कार स्वीकार करने के फैसलों पर सवाल उठाए गए हैं। लेखक ने ज्यां पाल सार्त्र और नोबेल पुरस्कार समेत कई उदाहरणों का उल्लेख करते हुए पुरस्कार स्वीकार करने या ठुकराने की बहस को सामने रखा है।





